Sunday, November 16, 2014

काश..


काश की हम यह समझ पाते, काश की हम यह कह पाते;
पर लबों तक लब्ज़ आते नहीं, दिल का दामन छोड़ पाते नहीं!

समय का न ठिकाना, न घर का कोई पता;
सुबह से शाम होने को है, रात की परछाई छूने को है !

अस्तित्व है भी या नहीं या हमारी नज़रों का यह मसला है;
किस्से कहें और क्या कहें; अब तक गुमनाम वह जो हैं!! 





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